क्या कारण है कि जो शिक्षक जनगणना, आर्थिक गणना, बालगणना, पशुगणना, पल्स पोलियो से लेकर चुनाव संबंधी सभी काम कुशलता से निभाते हैं, वे अध्यापन की कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे? जागरण संपादकीय में सुलगता सवाल

बदहाल शिक्षा : 

प्रदेश के स्कूलों में परीक्षाएं शुरू हो चुकी हैं, कुछ जगह जल्द ही शुरू होंगी। फिर प्रवेश के लिए आपाधापी मचेगी। यह आपाधापी अच्छे स्कूल-कॉलेजों में सीट सुरक्षित करने के लिए कम, मेरिट के नाम पर नई व्यवस्था ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के कारण ज्यादा होगी। छात्रों को सीटों की चिंता नहीं है। वे जानते हैं कि थोड़े से प्रयास से ही उन्हें कथित रूप से अच्छे स्कूल-कॉलेज में दाखिला मिल जाएगा। इसकी वजह यही है कि कभी जिन स्कूल-कॉलेजों में प्रवेश के लिए मारा-मारी मचती थी, अब वहां भी प्रतिभाशाली छात्रों का टोटा है। यदि छात्र-छात्रओं के मन में यह भाव आया है तो इसकी भी अपनी ठोस वजह है।




कुछ वर्षो में प्रदेश में शैक्षिक गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आई है। स्कूल-कॉलेजों में पठन-पाठन की दशा खराब हुई है। मौजूदा समय में प्रदेश में हाईस्कूल स्तर के 1903 शासकीय स्कूल हैं। इनमें कुछ स्कूल तो ऐसे हैं जहां का परीक्षा परिणाम 20 फीसद भी नहीं होता और तमाम तो ऐसे हैं जहां लगभग 20 फीसद छात्र अनुत्तीर्ण हो जाते हैं। इंटर कॉलेज की भी स्थिति इससे बेहतर नहीं है। इसके विपरीत निजी स्कूल-कॉलेज न केवल अपनी उपयोगिता साबित कर रहे हैं, बल्कि सतत रूप से परीक्षा परिणाम भी बेहतर देने की दिशा में अग्रसर हैं। सच तो यह है कि प्रदेश की शिक्षा राजनीति, अराजकता, अव्यवस्था, और कल्पनाहीनता का शिकार हो चुकी है।




अन्यथा क्या कारण है कि जो शिक्षक राष्ट्रीय कार्यक्रमों यथा जनगणना, आर्थिक गणना, बालगणना, पशुगणना, पल्स पोलियो से लेकर चुनाव से संबंधित सभी काम पूरी कुशलता और जिम्मेदारी से निभाते हैं, वे अध्यापन की कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे हैं। क्या वे अकर्मण्य और अयोग्य हैं? या फिर अपनी नौकरी और मिलने वाले वेतनमान से संतुष्ट नहीं हैं। यदि राजकीय स्कूल-कॉलेजों में शिक्षा का स्तर गिरा है तो इसकी कई वजह हो सकती है। पहली बात तो यही है कि विषय शिक्षक-शिक्षिकाओं का नितांत अभाव है। छात्रों की संख्या के हिसाब से अध्यापक पर्याप्त न होने से पढ़ाई प्रभावित होती है।




कुछ अध्यापक पढ़ाना भी चाहते हैं तो या तो अध्यापन में रुचि न लेने वाले अध्यापक ही उनके खिलाफ राजनीति करने लगते हैं या फिर अकर्मण्य शिक्षकों को देखकर अन्य शिक्षक भी उदासीन हो जाते हैं। दूसरी ओर शिक्षकों की किसी न किसी कारण से तमाम भर्तियां लटकी हुई हैं। प्रमोशन लंबे समय से अटका है। ऐसे बहुत से कारण हैं जो शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद होने की ओर धकेल रहे हैं। इन पर अतिशीघ्र काबू पाने की जरूरत है।

क्या कारण है कि जो शिक्षक जनगणना, आर्थिक गणना, बालगणना, पशुगणना, पल्स पोलियो से लेकर चुनाव संबंधी सभी काम कुशलता से निभाते हैं, वे अध्यापन की कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे? जागरण संपादकीय में सुलगता सवाल Reviewed by Sona Trivedi on 7:14 AM Rating: 5

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