गुरुपूर्णिमा विशेष : गुरुवर तुम्हारी कई कहानी, कुछ नई- कुछ पुरानी : स्कूल, कॉलेजों में शिक्षकों की हैं अपनी व्यथाएं, पब्लिक स्कूल व बच्चों की आधुनिकता के साथ कदमताल, सरकारी में हैं सुविधाविहीन और हुए पिछड़े

गुरुओं के प्रति नमन करने का दिन। स्कूल, कॉलेज, संस्थान हर जगह गुरुओं को श्रद्धापूर्वक याद किया जाएगा। लेकिन समाज में महत्वपूर्ण धुरी गुरु या यूं कहिए शिक्षक के रंग कई हैं। कहीं आधुनिकता के साथ कदमताल करते स्कूलों में पढ़ाते शिक्षक हैं तो पास में ही सरकारी स्कूलों में शिक्षक। वेतन, सुविधा और संसाधनों में जमीन-आसमान का अंतर है। यह अंतर केवल शिक्षकों में नहीं है बल्कि शिष्यों में भी है। निजी स्कूलों में टाई, शूट-बूट पहने बच्चे हैं तो दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में किंचित संसाधनों में स्कूल जाने की ललक है। एक तरफ बिजली, पंखें, सफाई और सुविधा है तो दूसरी ओर इनका घोर अभाव। इंटर कॉलेज, डिग्री कॉलेज और संस्थानों पर गौर करें तो वहां स्थिति दूसरी है। इंटर कॉलेजों में मोटा वेतन पाने वाले शिक्षक हैं। छात्र भी हैं। डिग्री कॉलेजों में तसवीर जुदा है। वहां शिक्षक चंद घंटों के लिए आते हैं। पढ़ाते हैं और चले जाते हैं। शिष्यों का भी कक्षा में आना-जाना कम है। निजी कॉलेजों में दूसरी दुनिया है।



रामपुर। वर्तमान में शिक्षक का लाइफ स्टाइल भी बदला है। मैनेजमेंट कॉलेज, निजी स्कूल और कॉलेजों में जाकर देखें तो शिक्षकों की स्थिति दूसरी दुनिया में ले जाती है। शिक्षकों के पास महंगे मोबाइल हैं। गैजेट्स हैं। अच्छी कार है। जिनके पास कार नहीं है, उनके पास टू व्हीलर हैं। चेहरे पर स्टाइलिश गूगल्स हैं। पब्लिक स्कूल और निजी कॉलेजों में शिक्षकों का यह लाइफ स्टाइल आम है। सरकारी स्कूलों में अधिकांश शिक्षिकाओं में भी इस लाइफ स्टाइल में मिल जाएंगी।



’ शिष्य या छात्रों के प्रति निष्ठा, पढ़ाई में ईमानदारी’ कम सुविधाओं के बावजूद समर्पण की भावना’ गुरु-शिष्य संबंधों में आदर्श स्थिति’ शिष्यों को आगे बढ़ाने की ललक’ शिष्यों में गुरु के प्रति श्रद्धा भाव ’ स्कूल और कॉलेज में साथ-साथ चलने की भावना’ न्यूनतम जरुरतों के साथ गुजर-बसर करने वाले शिक्षक



’ गुरु-शिष्य दोनों में निष्टा का भाव टूटा, सुविधाओं को प्राथमिकता’ पढ़ाई व निज कर्तव्य में दोनों स्तरों पर गिरावट’ गुरु-शिष्य के आर्दश संबंध सिर्फ उदाहरण स्वरूप ही बाकी ’ शिक्षकों का सिर्फ ड्यूटी पूरी करने पर जोर’ छात्रों में गुरु जैसा समर्पण भाव का अभाव’ गुरु-शिष्य में साथ-साथ चलने की भावना लगभग खत्म’ अब न्यूनतम सुविधा में जीवनयापन करने वाले शिक्षक बेहद कम




पुराने जमाने में मास्टर के हाथ में बेंत या सोंटा उसकी पहचान हुआ करता था। कुर्ता-पायजामा अधिकांश शिक्षकों का लिबास था। बच्चों के पास तख्ती, कलम-दवात हुआ करती थी। लेकिन आज ऐसा नहीं है। सौंटा और बैंत गायब हो गई है। शिक्षक की कक्षा में किसी छात्र की पिटाई करने की अब हिम्मत नहीं होती। शिक्षक अब शायद ही बच्चों को कलम बनाकर देते होंगे। कक्षा में ब्लैक बोर्ड तक बदल गए हैं। शिक्षकों का लिबास जिंस-टी शर्त, पैंट-शर्ट हो गया है।



सरकारी स्कूल, कॉलेज व संस्थानों को छोड़ दिया जाए तो निजी क्षेत्र में कार्यरत शिक्षकों की अपनी व्यथाएं भी हैं। छह से आठ घंटे दिनभर मेहनत करने के बावजूद इन शिक्षकों को कुछ नहीं मिलता। नौकरी की आड़ में शिक्षकों का अलग से शोषण होता है। रामपुर शहर में करीब एक हजार शिक्षक ऐसे हैं जो न्यूनतम वेतन में अपनी जिंदगी की गाड़़ी को खींच रही हैं। गली-मोहल्लों में खुले स्कूलों में इन शिक्षक-शिक्षिकाओं को मात्र तीन सौ रुपये से आठ सौ रुपये वेतन मिलता है।




चॉक घिसना और डायग्राम बनाना अब गुजरे जमाने की बात हो गई है। नए और मॉडर्न लुक के स्कूलों ने एनसीईआरटी पैटर्न को अपने स्मार्ट बोर्ड पर डिजाइन कराया है। इसमें हर शिक्षिका का अलग लॉगइन आईडी व पासवर्ड होता है। वह अपने सब्जेक्ट को स्मार्ट बोर्ड पर खोलती है और छात्रों को उसी हिसाब से पढ़ाती हैं। स्मार्ट बोर्ड पर डायग्राम बनाने की पूरी प्रक्रिया डिजीटल तरीके से समझाई जाती है। शहर के अधिकांश प्ले और पब्लिक स्कूलों ने इस फंडे को अपना लिया है। हालांकि सरकारी स्कूलों में बच्चों की जिंदगी इन आधुनिक संसाधनों से बहुत दूर है। वहां अभी भी चॉक है। ब्लैक बोर्ड है। बैठने को टाट-पट्टी है। वहां फिल्टर या एक्वागार्ड का पानी तो दूर, शौचालयों की व्यवस्था तक नहीं है। लेकिन शिक्षक और शिष्यों में शिक्षा को आगे बढ़ाने की जिजीविषा जारी है। भले ही इसमें कितनी ही खामियां क्यों न हों।

गुरुपूर्णिमा विशेष : गुरुवर तुम्हारी कई कहानी, कुछ नई- कुछ पुरानी : स्कूल, कॉलेजों में शिक्षकों की हैं अपनी व्यथाएं, पब्लिक स्कूल व बच्चों की आधुनिकता के साथ कदमताल, सरकारी में हैं सुविधाविहीन और हुए पिछड़े Reviewed by Sona Trivedi on 8:43 AM Rating: 5

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