किताब ही नहीं तो पढ़ाई का हिसाब कैसे? लाख कोशिशें के बाद भी प्राइमरी स्कूलों को पुस्तकें नहीं मिल पा रहीं, मौजूदा नीति की खामियों से बढ़ीं दिक्कतें


◆ सीएम की लाख कोशिशें के बाद भी प्राइमरी स्कूलों को पुस्तकें नहीं मिलीं
◆ मौजूदा नीति की खामियों से बढ़ीं दिक्कतें : निदेशक बेसिक शिक्षा
◆ पब्लिशर की लापरवाही से पिछले वर्ष नवम्बर में बंटी थीं स्कूलों में पुस्तकें
◆ अधिकारियों की लापरवाही बना रही छात्रों को कमजोर

लखनऊ। बेसिक शिक्षा निदेशक सव्रेन्द्र विक्रम बहादुर सिंह का कहना है कि मौजूदा नीति के चलते ही बुद्रा ड्रक को पुस्तकों की छपायी का काम सौंपा गया है। उन्होंने कहा कि वित्तीय बिड में प्राप्त न्यूनतम दर रीजनेबल न होने के कारण पुर्ननिविदा करने के लिए उन्होंने शासन को 9 मई 2017 को पत्र लिखा था, इसके पूर्व शासन द्वारा कतिपय शिकायतों के बाद आख्या मांगें जाने के बाद उन्होंने वित्तीय बिड खोले जाने की निर्धारित तिथियां स्थगित कर दी हैं। लेकिन चूंकि समय कम था और नीतियों में बदलाव सम्भव नहीं था, ऐसे में उक्त कम्पनी को काम मिला। उन्होंने कहा कि वह इस सम्बन्ध में प्रयासरत है कि जल्द से जल्द पुस्तक छप जाएं और जिलों में बंट जाय। उन्होंने कहा कि कई जिलों में पुस्तकों की कमी है, यह मामला न केवल उनके बल्कि शासन के भी संज्ञान में है।


मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लाख प्रयासों के बाद भी बेसिक शिक्षा विभागों के प्राइमरी स्कूलों में पाठ्य पुस्तकें डेढ़ महीने बाद भी नहीं मिली हैं। हाल यह है कि नौनिहाल पुरानी पुस्तकों के सहारे ‘‘समय’ बिता रहे हैं तो वहीं शिक्षक व विभागीय अधिकारी मामले को छिपाने में लगे हुए हैं। उधर बेसिक शिक्षा विभाग अभी भी प्रकाशक कम्पनी बुर्दा ड्रक के साथ खड़ी है। बताया जाता है कि उक्त पब्लिशर से किये गये कान्ट्रैक्ट में इतनी छूट दे दी गयी है कि खुद विभाग के अधिकारी भी चाहकर उसकी गर्दन नहीं पकड़ पा रहे हैं। गौरतलब है कि यह वही पब्लिशर है, जिसने 2016 में भी अधिकारियों के लाख कहने के बाद भी नवम्बर माह में पुस्तकों की सप्लाई दी थी।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशों के बाद भी बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारी अपनी ही चाल से चलते दिख रहे हैं। जुलाई माह में ही प्रदेश के सभी प्राथमिक स्कूलों में मूलभूत व्यवस्था जैसे कापी-किताब, कुर्सियां, भवन व पानी दुरूस्त करने के न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी के बाद अब विभाग पर मुख्यमंत्री के निर्देशों को भी न मानने का आरोप लगा है। इस बावत बेसिक शिक्षा निदेशक सव्रेन्द्र विक्रम सिंह पुस्तकों की आपूर्ति करने वाली जर्मनी की कम्पनी बुद्रा ड्रक को चाहकर भी घेर नहीं पा रहे हैं। बताया जाता है कि विभाग द्वारा किये गये करार में ऐसे-ऐसे क्लॉज पब्लिशर के हित में लिखे गये हैं कि विभाग चाहकर भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं कर पा रहा है।


सपा सरकार के जाने के बाद भी  बेसिक शिक्षा विभाग उसी तर्ज पर चल रहा है। पिछले वर्ष भी इसी जर्मन कम्पनी को पुस्तकों की छपाई का काम नीतियों में बदलाव के माध्यम से देने के चलते बवाल हुआ था। बुद्रा ड्रक की लापरवाही के चलते ही प्राथमिक स्कूलों के (एक से आठ तक) के बच्चों को किताबें पिछले वर्ष नवम्बर-2016 माह में बांटी जा सकीं थीं। यही नहीं तब कई जिलों के डीएम/बीएसए ने इस पर सवाल उठाए थे। पिछले वर्ष की नीति से मात्र एक ही कम्पनी बुर्दा ड्रंक इण्डिया को ही फायदा मिला और बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने जानबूझकर एक बार फिर इसी कम्पनी को निशुल्क पुस्तकों के प्रकाशन का ठेका दे दिया, जिसके बाद कयास लगने लगे थे कि इस वर्ष भी किताबों के मिलने पर देरी होगी और हुआ भी यही।

अगस्त महीने का चौथा सप्ताह शुरू हो चुका है और अभी भी राजधानी समेत प्रदेश के कई जिलों में पुस्तकों का अभाव है। सोशल मीडिया हो या टीवी चैनल सभी पर इस बावत न केवल खबरें प्रकाशित हो रही हैं बल्कि नौनिहालों व शिक्षकों की शिकायतें भी शासन को मिल रही हैं, इसके बाद भी एक बार फिर बेसिक शिक्षा निदेशक सव्रेन्द्र विक्रम सिंह उक्त बुद्रा ड्रक कम्पनी पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।

पिछले सत्र में डीएम ने की थी शिकायत : इलाहाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी संजय कुमार ने 23 मार्च 2017 को बेसिक शिक्षा सचिव को पत्र लिखकर मे. बुर्दा ड्रक इण्डिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा की गयी घटिया पुस्तकों की आपूर्ति, समयबद्ध आपूर्ति न करने तथा टेस्टिंग में किताबों के फेल होने की शिकायत की थी। कुछ ऐसी ही लिखित शिकायत तीन अन्य जिलाधिकारियों ने भी शासन में बैठे जिम्मेदारों से की थी।

किताब ही नहीं तो पढ़ाई का हिसाब कैसे? लाख कोशिशें के बाद भी प्राइमरी स्कूलों को पुस्तकें नहीं मिल पा रहीं, मौजूदा नीति की खामियों से बढ़ीं दिक्कतें Reviewed by Sona Trivedi on 9:19 AM Rating: 5

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