शिक्षक व अफसरों के बच्चे नहीं पढ़ते स्कूलों में, प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों का काला सच अब आ रहा सामने

⚫ सरकार शिक्षक व अफसरों के वेतन सहित अन्य मद पर खर्च करती है प्रतिमाह 25 अरब रुपये
⚫ यूनीफार्म, किताब, छात्रवृत्ति, मिड डे मील व अन्य मिलती है बच्चों को सुविधाएं



प्रदेश के लाखों परिषदीय विद्यालयों (प्राइमरी और जूनियर हाईस्कूल) की हालत दिनों दिन बद्तर होती जा रही हैक्योंकि बेहतर शिक्षण का माहौल न होने से बच्चों की संख्या कम होती जा रही है। यहां पढ़ाने वाले शिक्षक-शिक्षिकाएं, चाहे वह शिक्षामित्र हो या सहायक अध्यापक,अनुदेशक हो या प्रधानाचार्य, शिक्षा विभाग के अफसर हो या बाबू तक अपने बच्चों को इन परिषदीय विद्यालयों में नहीं पढ़ाते है जबकि परिषदीय विद्यालयों में शिक्षण करने वाले सिर्फ गरीब घर के बच्चे होते है जिनके यहां ब-मुश्किल से एक वक्त का चूल्हा जलता है।




शिक्षकों एवं अफसरों के सहित अन्य सुविधाओं पर प्रतिमाह करीब 25 अरब रुपये खर्च होता है। इसमें परिषदीय विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को मिडडे मील, ड्रेस, किताब, छात्रवृत्ति सहित अन्य सुविधाएं अलग से मिलती है ।इतना सब कुछहोने के बावजूद परिषदीय स्कूलों में मध्यम वर्गएवं अफसरों के बच्चे पढ़ने के लिए नही जाते है जिससे कि इन स्कूलों में जहां बच्चों की संख्या कम होती जा रही है वहीं हालत भी खराब होते जा रहे है।इस पर शिक्षा विभाग के अफसर और प्रदेश सरकार ध्यान नहीं दे रही है।




प्रदेश में एक लाख 60 हजार प्राइमरी स्कूल है जबकि 46 हजार जूनियर हाईस्कूल है। इनमें 32594 अनुदेशक, एक लाख 72 हजार शिक्षामित्र और करीब पांच लाख शिक्षक-शिक्षिकाएं है। 30 बच्चों पर एक शिक्षक के शिक्षण की सुविधा है।सबसे बड़ी बात यह है कि प्रदेश एवं केन्द्र सरकार पब्लिक के दिये टैक्स का सबसे बड़ा हिस्सा करीब 10 फीसद प्राथमिक शिक्षा पर खर्च करती है। परिषदीय विद्यालयों के बच्चों को प्रदेश सरकार की ओर से मिडडे मील, किताब, ड्रेस, छात्रवृत्ति सहित अन्य सुविधाएं मिलती है लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि इन परिषदीय विद्यालयों में शिक्षण करने वाले लाखों शिक्षामित्र, अनुदेशक, शिक्षक-शिक्षिकाएं ,प्रधानाचार्य,शिक्षा विभाग के अफसर और बाबुओं के बच्चे है वह भी इन प्राइमरी स्कूलों में नहंी पढ़ते हैबल्कि वह शहर के सबसे अच्छे और महंगें अंग्रेजी कांवेण्ट स्कूलों में पढ़ते है। जहां की फीस प्रतिमाह तीन से पांच हजार रुपये तक है, जबकिप्रवेश के लिए 25 हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक देना पड़ता है।




सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में प्रतिवर्षछात्र-छात्राओं की संख्या कम होती जा रही है जबकि खर्च बढ़ता जा रहा है।इस पर केन्द्र और प्रदेश सरकार को विशेष ध्यान देने हुए सख्त कदम उठाना पड़ेगा।



पढ़ाई के बीच आती है गुरु जी की नाक : परिषदीय विद्यालयों में शिक्षण करने वाले शिक्षकों और पढ़ने वाले बच्चों के बीच में गुरु जी की नाक आ जाती है क्योंकि गुरु जी आईएएस, आईपीएस, पीसीएस,पीपीएस, पीईएस, एमकाम, बीकाम, बीटेक, एमटेक, एमसीए, बीसीए सहित अन्य प्रतियोगी तैयारियां और उच्च स्तरीय पढ़ाई करने के बाद कईबार इण्टरव्यू तक जाने के बाद जब उनका चयन नहीं होता है तो वह निराशा होकर नौकरी के नाम पर प्राइमरी स्कूल में शिक्षक बन जाते है।ऐसे में उनका और बच्चों के मेंटल लेबल (पढ़ने-पढ़ाने के स्तर में)में व्यापक अंतर हो जाता है जिससे कि चाहकर गुरु जी बच्चों को नहीं पढ़ा पाते है। इससे भी शिक्षण व्यवस्था बदहाल हो रही है।




शहरी क्षेत्र के स्कूल बदहाल, गांव के कुछठीक : शहरी क्षेत्र के परिषदीय विद्यालय तो पूरी तरह से बदहाल है।वहां न तो बच्चें पढ़ने के लिए जाते है न ही विद्यालय में कुर्सी, मेज, पीने के पानी, बिजली, शौचालय सहित अन्य सुविधाएं रहती है। सफाई तो कहीं नही दिखती है। ऐसे विद्यालयों में बच्चे तो नाममात्र के होते है। उधर, ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में सफाई रहती है।वहां पर बैठने के लिए कम से कम टाट-पट्टी की व्यवस्था रहती है। पढ़ाने के लिए शिक्षक समय से आते है। बच्चों की संख्या भी ठीक रहती है। यहां पर बिजली और शौचालय की परेशानी रहती है लेकिन अधिकांश विद्यालयों में शौचालय बन गये है लेकिन वहां पर पानी की सुविधा नहीं है।

शिक्षक व अफसरों के बच्चे नहीं पढ़ते स्कूलों में, प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों का काला सच अब आ रहा सामने Reviewed by Sona Trivedi on 8:41 AM Rating: 5

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