शिक्षकों को पास करना ही होगी टीईटी 31 अगस्त 2028 तक मिली मोहलत, देश भर के 25 लाख शिक्षकों पर पड़ेगा सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर, देखें सुप्रीम कोर्ट ऑर्डर
शिक्षकों को पास करना ही होगी टीईटी 31 अगस्त 2028 तक मिली मोहलत, देश भर के 25 लाख शिक्षकों पर पड़ेगा सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर
टीईटी पास करनी ही होगी, समयसीमा एक साल बढ़ी, सुप्रीम कोर्ट का टीईटी की अनिवार्यता में छूट देने से साफ इन्कार
🔴 कोर्ट ने कहा, व्यावहारिक दिक्कतों को देखते हुए समय सीमा बढ़ाई जा रही
🔴 सरकारों को हिदायत टीईटी परीक्षा नियमित रूप से साल में दो बार कराएं
🔴 पहले 31 अगस्त, 2027 तक पास करना था टीईटी अब 2028 तक
30 मई 2026
दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को साफ कर दिया कि सरकारी शिक्षकों को सेवा में बने रहने के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उत्तीर्ण करनी ही होगी। अदालत ने हालांकि शिक्षकों और राज्यों की व्यावहारिक कठिनाइयों को देखते हुए टीईटी पास करने की समयसीमा दो वर्ष से बढ़ाकर तीन वर्ष कर दी। अब शिक्षकों को 31 अगस्त 2028 तक टीईटी उत्तीर्ण करनी होगी। कोर्ट ने साथ ही स्पष्ट किया कि इसके बाद समय सीमा किसी भी स्थिति में आगे नहीं बढ़ाई जाएगी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने राज्यों, शिक्षक संगठनों और शिक्षकों की ओर से दायर 65 पुनर्विचार याचिकाएं खारिज करते हुए यह आदेश दिया। याचिकाकर्ताओं ने 2025 के उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी, जिसमें कहा गया था कि आरटीई अधिनियम, 2009 लागू होने से पहले नियुक्त और सेवानिवृत्ति से पहले पांच वर्ष से अधिक सेवा शेष रखने वाले शिक्षकों को एक सितंबर 2025 से दो वर्ष के भीतर टीईटी उत्तीर्ण करनी होगी।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि टीईटी केवल औपचारिक परीक्षा नहीं, बल्कि प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। कोर्ट ने कहा कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना संविधान और आरटीई अधिनियम के तहत राज्य की जिम्मेदारी है। इसलिए शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता तय करना आवश्यक है।
पीठ ने उस तर्क को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि पुराने शिक्षकों पर टीईटी लागू करना कानून का पूर्वव्यापी इस्तेमाल है। अदालत ने कहा कि आरटीई अधिनियम में पहले से ही यह व्यवस्था है कि सेवारत शिक्षक भी निर्धारित समय के भीतर आवश्यक योग्यता प्राप्त करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर फैसला बदला नहीं जा सकता कि बड़ी संख्या में शिक्षक नौकरी खो सकते हैं। अदालत के अनुसार, बिना टीईटी योग्यता वाले शिक्षकों को लंबे समय तक सेवा में बनाए रखना आने वाली पीढ़ियों के शैक्षिक भविष्य को प्रभावित करेगा। अदालत ने कहा, "आरटीई अधिनियम बाल-केंद्रित कानून है और इसे इसी रूप में पढ़ा जाना चाहिए। शिक्षकों की सेवा बच्चों के शैक्षिक भविष्य की कीमत पर नहीं हो सकती।"
हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि कई राज्यों में नियमित रूप से टीईटी आयोजित नहीं होने और बड़ी संख्या में शिक्षकों के कारण व्यावहारिक दिक्कतें हैं। इसी को देखते हुए समयसीमा बढ़ाई गई है। कोर्ट ने राज्यों और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि टीईटी परीक्षा नियमित रूप से कराई जाए, अधिमानतः वर्ष में दो बार, ताकि शिक्षकों को पर्याप्त अवसर मिल सकें।
सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षक पात्रता परीक्षा की अनिवार्यता पर नहीं बदला अपना फैसला, टीईटी अनिवार्य, समयसीमा में एक वर्ष की वृद्धि
30 मई 2026
समझें सुप्रीम कोर्ट ऑर्डर 👇
न्यायालय ने विस्तार से निम्न प्रश्नों पर विचार किया:
1 क्या TET की अनिवार्यता अवैध है?
2 क्या यह सेवा शर्तों में पीछे से (retrospective) बदलाव है?
3 क्या लाखों शिक्षकों की नौकरी खतरे में पड़ सकती है?
4 क्या बच्चों के शिक्षा अधिकार को प्राथमिकता मिलनी चाहिए?
राज्यों के लिए निर्देश
कोर्ट ने कहा कि:
1 TET नियमित रूप से कराया जाए।
2 बेहतर होगा कि वर्ष में दो बार कराया जाए।
3 दोनों परीक्षाओं के बीच लगभग छह महीने का अंतर हो।
शिक्षकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष
यदि किसी शिक्षक ने अभी तक TET उत्तीर्ण नहीं किया है, तो:
1 TET की अनिवार्यता समाप्त नहीं हुई।
2 Anjuman Judgment कायम है।
3 Review Petition लगभग पूरी तरह असफल रही।
केवल समय-सीमा बढ़ी है।
4 अब TET उत्तीर्ण करने की अंतिम समय-सीमा 31 अगस्त 2028 है।
5 कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि इसके बाद और समय बढ़ाने की मांग स्वीकार नहीं की जाएगी।
Judgment का निष्कर्ष: TET अनिवार्य रहेगा, निर्णय सही है, शिक्षकों के तर्क अस्वीकार हैं; किन्तु मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए TET प्राप्त करने की अवधि 31 अगस्त 2028 तक बढ़ा दी गई है। आगे कोई अतिरिक्त विस्तार नहीं मिलेगा।
कानूनी दृष्टि से यह शिक्षकों की जीत नहीं, बल्कि सीमित राहत (limited relief) वाला निर्णय है। मूल सिद्धांत पूरी तरह राज्य और बच्चों के शिक्षा अधिकार के पक्ष में बरकरार रखा गया है।
30 मई 2026
देखें सुप्रीम कोर्ट ऑर्डर 👇
टीईटी अनिवार्यता मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित, शिक्षकों की निगाहें अब अंतिम आदेश पर
15 मई 2026
नई दिल्ली। टीईटी अनिवार्यता को लेकर चल रहे बहुचर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई है। कोर्ट द्वारा जारी संक्षिप्त आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि “Arguments concluded” यानी सभी पक्षों की बहस पूरी हो चुकी है तथा “Order reserved” अर्थात फैसला सुरक्षित रख लिया गया है।
अब लाखों शिक्षकों और शिक्षामित्रों की नजरें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर टिक गई हैं। यह मामला विशेष रूप से उन शिक्षकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो आरटीई लागू होने से पूर्व नियुक्त हुए थे और टीईटी की अनिवार्यता का विरोध कर रहे हैं।
शिक्षक संगठनों के बीच फैसले को लेकर लगातार चर्चाएं तेज हैं। कई संगठनों का कहना है कि वर्षों की सेवा के बाद नई अनिवार्यता लागू करना न्यायसंगत नहीं है, जबकि दूसरी ओर टीईटी को शिक्षा की न्यूनतम गुणवत्ता से जोड़कर देखा जा रहा है।
सोशल मीडिया और शिक्षक मंचों पर भी इस मामले को लेकर तीखी बहस जारी है। शिक्षक समुदाय अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश का इंतजार कर रहा है, क्योंकि यह फैसला देशभर की शिक्षा व्यवस्था और लाखों शिक्षकों के भविष्य पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
टीईटी की अनिवार्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख से लंबे समय से सेवाएं दे रहे शिक्षकों की बढ़ी चिंताएं
15 मई 2026
लखनऊः परिषदीय विद्यालयों में कार्यरत करीब 1.86 लाख शिक्षकों के सामने टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की अनिवार्यता बड़ी चुनौती बनी हुई है। बुधवार को मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, जहां अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया। हालांकि सुनवाई के दौरान कोर्ट के सख्त रुख से शिक्षकों की राहत की उम्मीद कमजोर पड़ती दिखी, जिससे लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों की चिंता बढ़ गई है।
पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जिन शिक्षकों की सेवा पांच वर्ष से अधिक शेष है या जो पदोन्नति चाहते हैं, उनके लिए टीईटी अनिवार्य होगा। कोर्ट के आदेश के बाद शिक्षक संगठन लगातार आंदोलन कर रहे हैं और सरकार से राहत की मांग कर रहे हैं।
इस बीच शिक्षक कई तकनीकी और प्रशासनिक समस्याओं से भी जूझ रहे हैं। कई महिला शिक्षकों ने सीटीईटी पास किया है, लेकिन विवाह के बाद सरनेम बदल जाने के कारण उनकी मार्कशीट डिजिलाकर से डाउनलोड नहीं हो पा रही है। हाईस्कूल प्रमाणपत्र और आधार या पैन कार्ड में नाम अलग होने से सत्यापन में दिक्कत आ रही है।
वहीं, बेसिक शिक्षा विभाग ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि प्राथमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापक और जूनियर सहायक अध्यापकों के लिए कौन-सा टीईटी मान्य होगा। कई शिक्षक जूनियर विद्यालयों में कार्यरत हैं, लेकिन उन्होंने प्राथमिक स्तर का टीईटी पास किया है। ऐसे मामलों में विभाग की ओर से कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी नहीं हैं।
उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के उपाध्यक्ष निर्भय सिंह ने कहा कि सरकार को व्यावहारिक समाधान निकालते हुए शिक्षकों और उनके परिवारों के हित में निर्णय लेना चाहिए। संगठनों का कहना है कि शिक्षक पहले से बीएलओ ड्यूटी और जनगणना जैसे कार्यों में व्यस्त हैं। ऐसे में टीईटी की तैयारी के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है।
शिक्षक बोले अब आर-पार की लड़ाई का समय
आल इंडिया बीटीसी शिक्षक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल यादव ने कहा कि आरटीई एक्ट 2009 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी अनिवार्यता थोपना लाखों शिक्षक परिवारों के भविष्य पर संकट खड़ा करने जैसा है। शिक्षकों की नियुक्ति उस समय लागू नियमों के अनुसार हुई थी और 20-25 साल सेवा लेने के बाद उन्हें अयोग्य बताना अन्यायपूर्ण है। सभी शिक्षक व कर्मचारी संगठनों से मतभेद भुलाकर एक मंच पर आने की अपील की है। आल इंडिया ज्वाइंट टीचर फेडरेशन के महासचिव दिलीप चौहान ने कहा कि विभाग लगातार प्रशिक्षण देकर शिक्षकों को अपडेट करता है, ऐसे में केवल टीईटी को योग्यता का अंतिम पैमाना नहीं माना जा सकता। इस फैसले से देश भर में 25 लाख परिवारों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।
शिक्षक संघों ने टीईटी की अनिवार्यता के फैसले पर पुनर्विचार का किया अनुरोध, सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला किया सुरक्षित
आरटीई कानून लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों के लिए टीईटी की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए
14 मई 2026
नई दिल्लीः कक्षा एक से आठ तक के बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए टीईटी की अनिवार्यता के फैसले का विभिन्न राज्य सरकारों और शिक्षक संघों ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में पुरजोर विरोध किया। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, मेघालय सरकार और देश भर के विभिन्न शिक्षक संघों ने सुप्रीम कोर्ट से फैसले पर पुनर्विचार का अनुरोध करते हुए कहा कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति आरटीई कानून लागू होने से पहले हुई है उन पर टीईटी की अनिवार्यता का नियम लागू नहीं होना चाहिए।
कहा उनकी नियुक्ति भर्ती के समय लागू नियमों के अनुसार हुई थी और अब वे दो दशक से ज्यादा समय से नौकरी कर रहे हैं। हालांकि कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आरटीई कानून को बच्चों के लिहाज से देखा जाना चाहिए। बच्चों को अच्छी शिक्षा, योग्य शिक्षक चाहिए अगर शिक्षक योग्य नहीं होंगे तो अच्छी शिक्षा कैसे मिलेगी। ये भी कहा कि नौकरी कर रहे शिक्षकों को टीईटी पास करने के लिए कोर्ट ने दो वर्ष का समय दिया है।
कोर्ट ने पुनर्विचार याचिकाओं पर सभी पक्षों की बहस सुनकर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। बुधवार को पीठ ने खुली अदालत में पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई की। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु सरकार ने कहा कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति आरटीई कानून लागू होने से पहले हुई है उन पर टीईटी की अनिवार्यता का नियम नहीं लागू होने चाहिए क्योंकि उनकी भर्ती के समय टीईटी नहीं था। उन शिक्षकों की भर्ती उस समय लागू नियम कानूनों के मुताबिक हुई थी।
हालांकि, कोर्ट दलीलों से बहुत संतुष्ट नहीं दिखा। कोर्ट ने वकीलों का ध्यान कानून के उपबंध की ओर खींचा, जिसमें पांच वर्ष में शिक्षकों को न्यूनतम योग्यता हासिल करने को कहा गया था और बाद में समय बढ़ाया गया था। कोर्ट ने कहा कि शिक्षकों को स्वयं को अपग्रेड करना चाहिए। तमिलनाडु सरकार ने अपने यहां के आंकड़े बताते हुए कहा कि ज्यादातर शिक्षक टीईटी पास नहीं हैं, अगर कोर्ट का आदेश लागू किया गया तो ज्यादातर शिक्षक बाहर हो जाएंगे। मेघालय और कुछ अन्य ने कोर्ट से टीईटी करने के लिए दो वर्ष की समय सीमा बढ़ा कर चार वर्ष करने का आग्रह किया। कोर्ट ने मांग पर विचार करने की बात कही।
देश भर के शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य किए जाने के मामले में पुनर्विचार याचिका पर आज होगी सुनवाई
13 मई 2026
लखनऊ। देश-प्रदेश के शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) अनिवार्य किए जाने के मामले में 13 मई को सुप्रीम कोर्ट में शिक्षकों की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई होगी। शिक्षक इसमें कोई चूक नहीं करना चाहते हैं। इसलिए देश के दो नामी वकील किए हैं, जो सुप्रीम कोर्ट में उनका पक्ष रखेंगे ताकि मामले में उनको राहत मिल सके।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने एक सितंबर 2025 के आदेश दिया था कि शिक्षण सेवा में बने रहने व पदोन्नति के लिए टीईटी अनिवार्य है। साथ ही कहा था कि जिन शिक्षकों की सेवा अवधि पांच साल से कम है, उन्हें टीईटी के बिना सेवा जारी रखने की अनुमति दी जाएगी। इसके बाद से देश भर के शिक्षक आंदोलन कर रहे हैं। वे वर्ष 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी से राहत देने की मांग कर रहे हैं। कई राज्यों के शिक्षक संगठनों ने भी इस मामले में अपने अधिवक्ता शिक्षकों को पक्ष रखने के लिए खड़े किए हैं।
टीईटी की अनिवार्यता के मामले में सुप्रीम कोर्ट 13 को खुली अदालत में पुनः करेगा सुनवाई, पुनर्विचार याचिकाओं पर खुली अदालत में सुनवाई करने की अर्जी स्वीकार
29 अप्रैल 2026
नई दिल्ली: कक्षा एक से आठ तक के छात्रों को पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए टीईटी की अनिवार्यता के फैसले के खिलाफ दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट खुली अदालत में सुनवाई करेगा। शीर्ष अदालत ने पुनर्विचार याचिकाओं पर खुली अदालत में सुनवाई की मांग स्वीकार कर ली है और चीफ जस्टिस का आदेश लेकर 13 मई को केस लगाने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश टीईटी की अनिवार्यता के आदेश से प्रभावित हो रहे शिक्षकों के लिए एक राहत की खबर है, क्योंकि खुली अदालत में सुनवाई होने से उनके वकील कोर्ट के समक्ष बहस कर पाएंगे और अपना पक्ष ज्यादा बेहतर तरीके से रख पाएंगे।
यह आदेश जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने दिया है। मालूम हो कि जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने ही एक सितंबर, 2025 को टीईटी की अनिवार्यता का फैसला दिया था। उस फैसले में कहा था कि कक्षा एक से आठ तक के छात्रों को पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों के लिए, जिनकी नौकरी पांच वर्ष से ज्यादा बची है, दो वर्ष के भीतर टीईटी पास करना अनिवार्य है। जिनकी नौकरी पांच वर्ष से कम बची है, उन्हें भी अगर प्रोन्नति पानी है तो टीईटी पास करना अनिवार्य है। हालांकि, जिनकी नौकरी पांच वर्ष से कम बची है, उन्हें टीईटी से छूट दे दी गई थी। कोर्ट के इस आदेश से पूरे देश में प्राथमिक और जूनियर कक्षाओं को पढ़ाने वाले पुरानी नियुक्ति के शिक्षकों में हड़कंप मच गया था।
इस आदेश का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर हो रहा है, जिनकी नियुक्ति आरटीई कानून लागू होने से पहले यानी 2010 से पहले हुई है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ देशभर के विभिन्न शिक्षक संघों, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सहित विभिन्न राज्य सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल कर रखी है। सुप्रीम कोर्ट के तय नियम के मुताबिक पुनर्विचार याचिका पर फैसला सुनाने वाली पीठ ही चैंबर में सर्कुलेशन के जरिये सुनवाई करती है। वहां पक्षकारों के वकील नहीं होते। माननीय न्यायाधीश फाइलों को देखकर फैसला लेते हैं। हालांकि, ज्यादातर मामलों में पुनर्विचार याचिकाओं के साथ एक अर्जी दाखिल की जाती है, जिसमें पुनर्विचार याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई का अनुरोध किया जाता है। अगर कोर्ट को मामला पुनर्विचार का लगता है और खुली अदालत में सुनवाई की जरूरत दिखती है, तो कोर्ट पुनर्विचार याचिका को खुली अदालत में सुनवाई के लिए लगाने का आदेश देती है, जिसमें पक्षकारों के वकील पेश होकर दलीलें रखते हैं।
इस मामले में पुनर्विचार याचिकाओं पर गत 28 अप्रैल को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने चैंबर में विचार किया और मामले को खुली अदालत में सुने जाने की अर्जी स्वीकार करते हुए चीफ जस्टिस का आदेश लेकर केस को 13 मई को दोपहर दो बजे लगाने का निर्देश दिया। मामले की खुली अदालत में सुनवाई पर संतोष जाहिर करते हुए आल इंडिया बीटीसी शिक्षक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल यादव कहते हैं कि इससे शिक्षकों में उम्मीद जगी है उन्हें कोर्ट से जरूर न्याय मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट में टीईटी अनिवार्यता के निर्णय पर पुनर्विचार की राह खुली, 13 मई को होगी अहम सुनवाई
🔴 सुप्रीम कोर्ट ने टीईटी अनिवार्यता से जुड़े मामले में दायर पुनर्विचार याचिकाओं को गंभीर मानते हुए ओपन कोर्ट में सुनवाई के लिए स्वीकार किया, अगली सुनवाई 13 मई 2026 को होगी।
🔴 अदालत का यह आदेश अंतिम फैसला नहीं है, बल्कि संकेत है कि टीईटी अनिवार्यता पर अभी पुनर्विचार जारी है, जिससे शिक्षकों और सरकार को अपना पक्ष रखने का एक और मौका मिला है
30 अप्रैल 2026
नई दिल्ली/लखनऊ: शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता से जुड़े बहुचर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए पुनर्विचार याचिकाओं को खुली अदालत में सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। 28 अप्रैल 2026 को पारित आदेश में अदालत ने कहा कि इन याचिकाओं को 13 मई 2026 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।
यह मामला उत्तर प्रदेश सरकार बनाम अंजुमन इशाअत-ए-तालीम ट्रस्ट एवं अन्य से संबंधित है, जिसमें 1 सितंबर 2025 को आए फैसले के खिलाफ कई पक्षों ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर की हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं को गंभीर मानते हुए उन्हें खुली अदालत में सुनने का निर्णय लिया है, जो इस विवाद की संवेदनशीलता और व्यापक प्रभाव को दर्शाता है।
गौरतलब है कि पहले दिए गए फैसले के बाद टीईटी की अनिवार्यता को लेकर देशभर में विशेषकर उत्तर प्रदेश में हजारों शिक्षक असमंजस और तनाव की स्थिति में हैं। कई शिक्षक संगठनों और राज्य सरकार ने इस फैसले के विभिन्न पहलुओं पर आपत्ति जताते हुए पुनर्विचार की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा आदेश फिलहाल किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता, बल्कि यह संकेत देता है कि मामला अभी विचाराधीन है और अंतिम निर्णय आना बाकी है। अदालत द्वारा ओपन कोर्ट में सुनवाई की अनुमति दिए जाने को इस पूरे विवाद में एक अहम मोड़ माना जा रहा है।
अब सभी की निगाहें 13 मई को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह स्पष्ट हो सकेगा कि टीईटी की अनिवार्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट अपने पूर्व निर्णय में कोई बदलाव करता है या उसे बरकरार रखता है।
TET अनिवार्यता पर पुनर्विचार पर आज आयेगा सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, देशभर के लाखों शिक्षकों की बढ़ी धड़कनें, पुराने शिक्षकों की बचेगी या जाएगी नौकरी?
आरटीई अधिनियम 2009 से पहले नियुक्त प्राथमिक शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य करने के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर 40 पुनर्विचार याचिकाओं पर निर्णय आज
टीईटी अनिवार्यता पर सर्वोच्च न्यायालय पर शिक्षकों की निगाहें टिकीं।
27 अप्रैल 2026
नई दिल्ली । राज्य में निश्शुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (आरटीई) लागू होने से पूर्व कार्यरत प्राथमिक शिक्षकों की निगाहें सर्वोच्च न्यायालय के ऊपर टिकी हैं। इन शिक्षकों के लिए भी शिक्षक पात्रता परीक्षा (टेट) उत्तीर्ण होने के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध विभिन्न राज्यों तथा शिक्षक संघों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल पुनर्विचार याचिका पर मंगलवार को कुछ न कुछ आदेश आ सकता है।
बताया जाता है कि पुनर्विचार याचिका के तहत संबंधित न्यायाधीश अपने चेंबर में पिटीशन में रखे गए तथ्यों को देखेंगे, जिसके बाद अपने आदेश को बरकरार रखने या सुनवाई करने का अपना निर्णय सुनाएंगे। इसमें याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं को पक्ष रखने की अनुमति नहीं होगी। कोर्ट सुनवाई को तैयार होता है तब ही उसमें अधिवक्ता याचिकाकर्ताओं का पक्ष रख सकेंगे।
सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले वर्ष पारित अपने एक आदेश में आरटीई लागू होने से पूर्व नियुक्त उन प्राथमिक शिक्षकों के लिए भी टेट उत्तीर्ण होना अनिवार्य किया है, जिनकी सेवा पांच वर्ष से अधिक बची है। इसके लिए शिक्षकों को दो वर्ष का समय दिया गया है। इस अवधि में टेट उत्तीर्ण नहीं होने पर राज्य सरकारों उन्हें सेवा से हटा सकेंगी। साथ ही शिक्षकों की प्रोन्नति के लिए भी यह परीक्षा उत्तीर्ण होना अनिवार्य होगा। यह उन शिक्षकों पर लागू होगा जिनकी सेवा पांच वर्ष से कम बची है।
इधर, देशभर के प्राथमिक शिक्षक इसे लागू नहीं करने की मांग कर रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के विरुद्ध कुल 40 पुनर्विचार याचिका दाखिल हुई है, जिनमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बंगाल, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, केरल, मेघालय तथा ओडिशा राज्य की सरकारों भी सम्मिलित हैं। वहीं, राष्ट्रीय स्तर के भी कई संघों ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। इन्हीं याचिकाओं पर एक साथ मंगलवार को विचार किया जाएगा।
शिक्षकों को पास करना ही होगी टीईटी 31 अगस्त 2028 तक मिली मोहलत, देश भर के 25 लाख शिक्षकों पर पड़ेगा सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर, देखें सुप्रीम कोर्ट ऑर्डर
Reviewed by प्राइमरी का मास्टर 2
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8:19 AM
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