बुनियादी शिक्षा में गुणवत्ता के नाम पर सिफर रहीं व्यवस्थाएं, शासनादेशों का जमीनी क्रियान्वयन हुआ ढेर, शिक्षकों का मूल्यांकन का फार्मूला ही तय ना हो सका

लखनऊ। बुनियादी शिक्षा में गुणवत्ता के सुधार का एक वर्ष बीत गया लेकिन कुछ हाथ नहीं आया। बात हुई थी कि शिक्षकों, स्कूल और बच्चों का मूल्यांकन होगा। बच्चों के मूल्यांकन के लिए परीक्षाएं शुरू की गईं। स्कूलों की ग्रेडिंग यानी श्रेणीकरण के लिए शासनादेश जारी किया गया और शिक्षकों के मूल्यांकन के लिए विभाग तय ही नहीं कर पाया कि कैसे करें। लिहाजा पूरा वर्ष ऐसे ही बीत गया।

बच्चों के मूल्यांकन के लिए शिक्षा का अधिकार कानून में परीक्षा की जगह सतत व्यापक मूल्यांकन की व्यवस्था की गई यानी पूरे वर्ष के प्रदर्शन के आधार पर मूल्यांकन लेकिन जब तक पूरी प्रणाली विकसित हो पाती परीक्षा शुरू करवाने पर सहमति बन गई। चालू शैक्षिक सत्र से परीक्षाएं दोबारा शुरू कर दी गईं। वहीं स्कूलों को सुविधाओं और पढ़ाई के हिसाब से श्रेणीकृत करने पर शासनादेश जारी किया गया। इसमें स्कूलों को विभिन्न मानकों पर श्रेणियां देनी थी लेकिन बात शासनादेश से आगे बढ़ती नहीं दिख रही।

अब निदेशालय को इस शासनादेश की याद आई तो मार्च, 2016 तक जिलो ंसे रिपोर्ट मांगी गई है। अध्यापकों के मूल्यांकन को लेकर अभी तक कोई व्यवस्था नहीं बन पाई है।

बुनियादी शिक्षा में गुणवत्ता के नाम पर सिफर रहीं व्यवस्थाएं, शासनादेशों का जमीनी क्रियान्वयन हुआ ढेर, शिक्षकों का मूल्यांकन का फार्मूला ही तय ना हो सका Reviewed by प्रवीण त्रिवेदी on 5:28 PM Rating: 5

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